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साहित्य

न बरसें झूम कर बादल घिरा सावन नहीं कहते


साहित्य 16 पटक पढिएको ज्योति राव क्रान्तिद्वार दैनिक


न बरसें झूम कर बादल घिरा सावन नहीं कहते


 न बरसें झूम कर बादल घिरा सावन नहीं कहते 

न हों किलकारियाँ तो चौक को आँगन नहीं कहते 

वही है राह चल जिस पर पहुँच जाते है मंजिल तक

बताये सच न जो सब को उसे दरपन नहीं कहते 

लगे माथे पर तो सब को बचा लेता बलाओं से

सजाये जो न आँखों को उसे अंजन नहीं कहते 

हजारों नाग लिपटे हों रहे फिर भी सदा शीतल

न हो निर्लिप्त जो विष से उसे चन्दन नहीं कहते 

करे निस्वार्थ सेवा हो नहीं प्रतिदान की इच्छा

जहाँ हो चाह पाने की उसे अरपन नहीं कहते 

बहुत जद्दो जहद हो ज़िन्दगी का बोझ हो भारी

न हो बेफ़िक्र चंचल तो उसे बचपन नहीं कहते

ज्योति राव 

सिंघरौली मध्य प्रदेश




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